जबलपुर. एमपी के जबलपुर में नानाजी देशमुख पशु चिकित्सा विज्ञान विश्वविद्यालय में पंचगव्य शोध परियोजना के दौरान हुए कथित घोटाले के मामले में विश्वविद्यालय प्रशासन ने अपना रुख स्पष्ट किया है. प्रशासन ने पत्रकारों से चर्चा में सभी आरोपों को पूरी तरह निराधार बताते हुए कहा कि शोध कार्य के दौरान की गई सभी खरीदारी और अधिकारियों द्वारा की गई यात्राएं पूरी तरह से सरकारी नियमों के दायरे में थीं. प्रशासन का कहना है कि विश्वविद्यालय की छवि खराब करने के लिए यह भ्रामक प्रचार किया जा रहा है.
यह विवाद उक्त वक्त शुरू हुआ जब संभाग कमिश्नर से इस संबंध में शिकायत की गई थी. शिकायत में आरोप लगाया गया था कि शासन से मिली लगभग 1 करोड़ 92 लाख रुपये की राशि का दुरुपयोग किया गया है. आरोप है कि गोबर, गौमूत्र और गमलों जैसी चीजों की खरीदारी में भारी अनियमितता बरती गई और मशीनों की कीमत बाजार भाव से कहीं अधिक दिखाई गई. इसके अलावा शोध के नाम पर अधिकारियों द्वारा 20 से अधिक बार हवाई यात्राएं करने का भी आरोप लगा था.
जिसके बाद कलेक्टर के निर्देश पर जिला स्तर पर जांच दल गठित किया गया था. प्रेस वार्ता के दौरान विश्वविद्यालय प्रशासन ने विस्तार से बताया कि एस्टेब्लिशमेंट ऑफ इंडीजीनस कैटल रिसर्च सेंटर फॉर डेवलपमेंट ऑफ पंचगव्य प्रोडक्ट्स परियोजना को जून 2012 में राज्य स्तरीय समिति द्वारा स्वीकृति मिली थी. डॉ वायपी साहनी इस परियोजना की मुख्य अन्वेषक थीं. प्रशासन का तर्क है कि परियोजना की विस्तृत रिपोर्ट में एक वाहन और आवश्यक यात्राओं का स्पष्ट प्रावधान था.
परियोजना का उद्देश्य स्वदेशी और विदेशी शंकर गौवंश के मूत्र एवं गोबर से बने उत्पादों का तुलनात्मक अध्ययन करना थाए जिसे सफलतापूर्वक पूरा कर लिया गया है. विश्वविद्यालय ने स्पष्ट किया कि परियोजना के तहत खरीदा गया सारा सामान और उपकरण वर्तमान में संस्थान में मौजूद हैं और क्रियाशील हैं. प्रशासन के अनुसार मध्य प्रदेश शासन के क्रय.विक्रय नियमों का पूरी तरह पालन किया गया है और सभी बिलों का भुगतान ऑडिट के बाद ही किया गया था. हर साल परियोजना के व्यय का ऑडिट कराकर पयोगिता प्रमाण पत्र आरकेवीवा को समय पर भेजा गया है. विवि का दावा है कि सभी वित्तीय लेनदेन पारदर्शी रहे हैं और किसी भी स्तर पर नियमों का उल्लंघन नहीं हुआ है.
