जबलपुर. मध्य प्रदेश के इंफ्रास्ट्रक्चर विकास के इतिहास में जबलपुर और महाकौशल अंचल के लिए एक निर्णायक मोड़ आता दिख रहा है. केंद्र और राज्य सरकार की संयुक्त महायोजना के तहत करीब 36 हजार करोड़ रुपये की लागत से प्रस्तावित 6 एक्सप्रेसवे और ग्रीनफील्ड हाईवे नेटवर्क में जबलपुर को रणनीतिक रूप से केंद्र में रखा गया है. इसका सीधा मतलब है कि संस्कारधानी अब केवल सांस्कृतिक और प्रशासनिक पहचान तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि आने वाले वर्षों में प्रदेश का प्रमुख लॉजिस्टिक्स, ट्रांसपोर्ट और ट्रेड हब बनने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ेगी. इस योजना को लेकर राजनीतिक, औद्योगिक और प्रोफेशनल गलियारों में गहरी हलचल है और इसे महाकौशल के लिए अब तक की सबसे बड़ी विकासात्मक सौगात माना जा रहा है.
सरकारी स्तर पर मिली जानकारी के अनुसार, इन एक्सप्रेसवे और ग्रीनफील्ड हाईवे का उद्देश्य सिर्फ शहरों को जोड़ना नहीं, बल्कि मध्य प्रदेश की भौगोलिक केंद्रीयता को आर्थिक ताकत में बदलना है. जबलपुर इस पूरी योजना में इसलिए खास है क्योंकि यह पूर्व–पश्चिम और उत्तर–दक्षिण दोनों कॉरिडोर को जोड़ने वाली प्राकृतिक कड़ी के रूप में उभर रहा है. प्रस्तावित नर्मदा एक्सप्रेसवे और महाकौशल से गुजरने वाले अन्य हाईवे जबलपुर को सीधे नागपुर, रायपुर, प्रयागराज, वाराणसी और आगे पूर्वी भारत के बड़े व्यापारिक केंद्रों से जोड़ेंगे. इससे माल ढुलाई का समय घंटों नहीं बल्कि मिनटों में सिमट जाएगा और ट्रांसपोर्ट लागत में भारी कमी आएगी.
इन ग्रीनफील्ड हाईवे की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इन्हें पुराने, भीड़भाड़ वाले और आबादी से घिरे मार्गों से अलग बिल्कुल नए रूट पर विकसित किया जा रहा है. इससे न केवल भूमि अधिग्रहण से जुड़े विवाद कम होंगे, बल्कि आधुनिक डिजाइन, हाई-स्पीड लेन, सर्विस रोड, स्मार्ट ट्रैफिक सिस्टम और अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा मानकों को लागू करना भी आसान होगा. जबलपुर के आसपास प्रस्तावित लॉजिस्टिक्स पार्क, वेयरहाउसिंग जोन और ट्रांसपोर्ट टर्मिनल इस पूरे नेटवर्क की रीढ़ बनेंगे. जानकारों का मानना है कि एक बार यह ढांचा खड़ा हो जाने के बाद जबलपुर महाकौशल का औद्योगिक प्रवेश द्वार बन जाएगा.
इस महायोजना का सीधा असर रोजगार और स्थानीय अर्थव्यवस्था पर भी पड़ने वाला है. निर्माण चरण में ही हजारों कुशल और अकुशल श्रमिकों को काम मिलेगा, वहीं बाद के वर्षों में ट्रांसपोर्ट, वेयरहाउसिंग, मैन्युफैक्चरिंग, एग्री-प्रोसेसिंग और सर्विस सेक्टर में स्थायी रोजगार के अवसर पैदा होंगे. जबलपुर, कटनी, मंडला, डिंडोरी और नरसिंहपुर जैसे जिलों के युवा, जिन्हें अब तक रोजगार के लिए दूसरे राज्यों की ओर रुख करना पड़ता था, उन्हें अपने ही क्षेत्र में अवसर मिलने की उम्मीद जगी है. उद्योग जगत का मानना है कि बेहतर कनेक्टिविटी के साथ महाकौशल में निवेश का माहौल तेजी से बदलेगा.
रियल एस्टेट और भूमि बाजार में भी इस योजना का असर साफ दिखने लगा है. प्रस्तावित एक्सप्रेसवे रूट के आसपास के इलाकों में जमीन की कीमतों में उछाल देखा जा रहा है और कई बड़े डेवलपर्स ने जबलपुर पर फोकस बढ़ा दिया है. औद्योगिक प्लॉट, लॉजिस्टिक्स गोदाम और कमर्शियल हब के लिए जमीन की मांग बढ़ रही है. हालांकि सरकार का दावा है कि विकास के इस मॉडल में स्थानीय किसानों और जमीन मालिकों के हितों का विशेष ध्यान रखा जाएगा और मुआवजा नीति को पारदर्शी बनाया जाएगा ताकि विकास के साथ सामाजिक संतुलन भी बना रहे.
पर्यावरण को लेकर उठने वाले सवालों पर भी सरकार ने स्पष्ट रुख अपनाया है. अधिकारियों के अनुसार, ग्रीनफील्ड हाईवे परियोजनाओं में पर्यावरणीय प्रभाव आकलन को प्राथमिकता दी गई है. हाईवे के दोनों ओर बड़े पैमाने पर पौधारोपण, रेन वॉटर हार्वेस्टिंग सिस्टम, साउंड बैरियर और वन्यजीवों की आवाजाही के लिए अंडरपास जैसी व्यवस्थाएं अनिवार्य की जाएंगी. नर्मदा घाटी और आसपास के संवेदनशील क्षेत्रों में विशेष सावधानी बरती जाएगी ताकि विकास और प्रकृति के बीच संतुलन बना रहे.
जबलपुर के सामाजिक और आर्थिक परिदृश्य में यह योजना एक नई पहचान गढ़ने वाली साबित हो सकती है. अब तक प्रशासनिक, शैक्षणिक और सैन्य दृष्टि से पहचाने जाने वाला शहर आने वाले समय में ट्रांसपोर्टेशन और लॉजिस्टिक्स के नक्शे पर भी प्रमुख स्थान हासिल करेगा. विशेषज्ञों का कहना है कि जिस तरह इंदौर ने मालवा में औद्योगिक केंद्र की भूमिका निभाई है, उसी तरह जबलपुर महाकौशल में विकास का इंजन बन सकता है. यह बदलाव सिर्फ शहर तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि आसपास के ग्रामीण इलाकों को भी मुख्यधारा की अर्थव्यवस्था से जोड़ेगा.
सरकार की ओर से संकेत दिए गए हैं कि जल्द ही टेंडर प्रक्रिया और विस्तृत परियोजना रिपोर्ट को अंतिम रूप दिया जाएगा. समय-सीमा तय कर चरणबद्ध तरीके से निर्माण कार्य शुरू किया जाएगा ताकि परियोजना समय पर पूरी हो सके. कुल मिलाकर 36 हजार करोड़ की यह एक्सप्रेस वे योजना जबलपुर और महाकौशल के लिए सिर्फ एक इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट नहीं, बल्कि आने वाले दशकों की आर्थिक दिशा तय करने वाला कदम मानी जा रही है, जो संस्कारधानी को प्रदेश के नए विकास केंद्र के रूप में स्थापित करने की पूरी क्षमता रखती है.
