संस्कारधानी के वैचारिक क्षितिज पर चेतना का नव सूर्योदय, जहाँ अध्यात्म और विज्ञान के पावन संगम से आलोकित होगा गीता भवन


 जबलपुर। नववर्ष की देहरी पर खड़ा संस्कारधानी जबलपुर केवल कैलेंडर का पन्ना नहीं पलट रहा, बल्कि वह अपने वैचारिक जीवन के एक नए अध्याय में प्रवेश कर रहा है। नर्मदा की लहरों की तरह शांत और गहरी इस धरती पर अब विचारों की एक नई धारा प्रवाहित होने जा रही है। नववर्ष की पहली सुबह जब हल्की धूप के साथ उम्मीद की गर्माहट शहर की फ़िज़ाओं में घुलेगी, तब संस्कारधानी को एक ऐसा आत्मीय उपहार मिलने जा रहा है, जो ईंट-पत्थर से नहीं, बल्कि चेतना, विवेक और संवेदना से निर्मित होगा। घंटाघर स्थित नेताजी सुभाष चंद्र बोस कन्वेंशन सेंटर परिसर में आकार ले रहा ‘गीता भवन वैचारिक अध्ययन केंद्र’ इसी नवचेतना का सजीव प्रतीक बनने जा रहा है। यह केंद्र उस पावन संगम की तरह होगा जहाँ प्राचीन ऋषियों का मौन और आधुनिक युग का मुखर विज्ञान एक साथ बैठकर मानवता के भविष्य की लिपि लिखेंगे।

यह शहर केवल भूगोल का हिस्सा नहीं है, यह तो शब्दों, भावों और आंदोलनों से निर्मित एक सजीव इकाई है। जबलपुर की इसी तासीर को समझते हुए मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने एक ऐसे विचार-लोक की परिकल्पना की जहां युवा पीढ़ी अपनी जड़ों की गहराई को नाप सके और भविष्य के ऊंचे आसमान की ओर उड़ान भर सके। उनकी यह सोच कि "विज्ञान यदि गति है तो अध्यात्म दिशा है" इस भवन के कण-कण में रची-बसी दिखाई देती है। मुख्यमंत्री की इस परिकल्पना के केंद्र में केवल आधुनिक अधोसंरचना नहीं, बल्कि संतुलित मनुष्य का निर्माण है। उनकी सोच स्पष्ट है कि जब विज्ञान और अध्यात्म का संगम होता है, तब समाज केवल आगे नहीं बढ़ता, बल्कि सही दिशा में बढ़ता है। यह केंद्र इसी संतुलन का मूर्त रूप बनेगा, जहां आधुनिकता की चकाचौंध में भटकते मन को ठहराव, अर्थ और आत्मिक शांति का अनुभव होगा।

नगर निगम जबलपुर द्वारा विकसित किया जा रहा यह केंद्र अध्ययन, चिंतन और संवाद का एक आत्मीय आश्रय स्थल होगा। महापौर जगत बहादुर सिंह अन्नू, निगमाध्यक्ष रिंकू बिज और निगमायुक्त रामप्रकाश अहिरवार के संयुक्त प्रयासों और प्रतिबद्धता से इस केंद्र की रूपरेखा तैयार की गई है। यहां प्रवेश करते ही व्यक्ति को केवल पुस्तकालय की अलमारियां नहीं दिखेंगी, बल्कि एक ऐसा वातावरण महसूस होगा जो स्वयं व्यक्ति से संवाद करता प्रतीत होगा। आधुनिक ई-लाइब्रेरी, हाई-स्पीड इंटरनेट और डिजिटल वाचनालय शोधकर्ताओं के लिए ज्ञान का खुला आकाश होंगे, वहीं इसके शांत कोने किसी जिज्ञासु को गीता के श्लोकों में जीवन के शाश्वत प्रश्नों के उत्तर तलाशने का अवसर प्रदान करेंगे। यह स्थान पढ़ने भर का नहीं, बल्कि भीतर झांकने का अवसर देगा।

इस अध्ययन केंद्र की वास्तविक आत्मा इसकी वैचारिक विविधता में धड़कती है। यहाँ निर्मित ‘गीता कक्ष’ और ‘रामायण कक्ष’ केवल धार्मिक ग्रंथों के संग्रह स्थल नहीं हैं बल्कि वे कर्म, मर्यादा, कर्तव्य और करुणा जैसे वैश्विक मूल्यों पर मंथन करने के आधुनिक मंच हैं। इसी क्रम में ‘सर्वधर्म समभाव कक्ष’ भारतीय संस्कृति की उस उदार दृष्टि को रेखांकित करेगा जहाँ भिन्नताओं के बीच भी एकता की एक महीन डोर सबको जोड़े रखती है। यह स्थान मतभेदों को मिटाकर संवाद को जन्म देने की एक पवित्र कोशिश है। वहीं दूसरी ओर हाई-स्पीड इंटरनेट और नवीनतम डिजिटल संसाधनों से लैस विज्ञान खंड इस केंद्र को समकालीन युग की प्रयोगशाला बनाता है। जब यहाँ बैठा कोई युवा क्वांटम भौतिकी के साथ-साथ उपनिषदों के दर्शन को पढ़ेगा तब उसे बोध होगा कि समस्त ज्ञान का अंतिम ध्येय केवल प्रतिस्पर्धा नहीं बल्कि समग्र मानव कल्याण है।

संवाद की लुप्त होती संस्कृति को पुनर्जीवित करना इस केंद्र का एक बड़ा संकल्प है। यहाँ समय-समय पर आयोजित होने वाली वैचारिक संगोष्ठियां, व्याख्यान और कार्यशालाएं संस्कारधानी के बौद्धिक जीवन में नई ऊर्जा भरेंगी। साहित्यकार, दार्शनिक, वैज्ञानिक और सामाजिक चिंतक जब एक ही मंच पर अपने विचार साझा करेंगे, तो उससे उपजी जिज्ञासा की लौ हज़ारों युवाओं के मन को आलोकित करेगी। यहाँ का कैफेटेरिया और खुले संवाद स्थल भी किसी चौपाल से कम नहीं होंगे, जहाँ चाय की चुस्कियों के बीच सहज बातचीत और गंभीर विमर्श की परंपरा जीवित होगी। यह वही आत्मीय संस्कृति है, जिसमें कभी साहित्यिक बैठकों के माध्यम से समाज की दिशा तय होती थी।

नववर्ष पर संस्कारधानी को मिलने वाला यह वैचारिक उपहार यह संदेश देता है कि वास्तविक प्रगति भौतिक संरचनाओं से अधिक विचारों की परिपक्वता और संवेदना की गहराई में निहित है। जब नववर्ष की पहली सुबह संस्कारधानी की फ़िज़ाओं में कदम रखेगी, तब यह शहर केवल नए साल का स्वागत नहीं करेगा, बल्कि विचार, विवेक और संवेदना से भरे एक नए वैचारिक युग का अभिनंदन करेगा। अध्यात्म और विज्ञान के इस संगम से उपजी ज्योति जबलपुर की आत्मा को और अधिक उज्ज्वल करेगी और यह केंद्र आने वाले वर्षों तक संस्कारधानी की पहचान का एक स्थायी प्रकाश स्तंभ और मानवता का मार्ग प्रशस्त करने वाली ज्योति बना रहेगा।

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